Thursday, March 19, 2026

आज को जीने नहीं देता

गद्दार, बेवफ़ा है यह मन की आदत 

जो सदियों पुरानी बातें दिखाए जैसे कल, 

और कल की बातें जैसे कभी हुई ही नहीं। 

जो जा चुके है, उनका वापसी संभव, 

जो आँखों के सामने, वह है ही नहीं। 

भला क्यों है ऐसा, मन का मन जो चाहे, 

क्यों मैं भी? ज़बरदस्ती? 

जो एक दिन थे आसमान जैसे साफ़, बेदाग, 

आज है मिटी हुई तहरीरें, जो लिखा था इसमें 

अब याद नहीं।

चालक है यार मन, लेकिन सिर्फ़ दिल के लिए

ताकि वह फ़िरसे जीने की हिमाफ़त कर सके। 

रात को सोने से पहले मैं कभी मन पर गुस्सा होती हूँ, 

पर वह हसकर कहता है की 

यादों को भूलना ज़रूरी था मेरे दोस्त,

वरना गुज़रा हुआ कल आज को जीने नहीं देता। 

बात तो सही है। भोज भारी नहीं है, हम आगे चल सके। 

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